थॉमस हॉब्स : जीवन परिचय, राजनीतिक विचार एवं रचनाएँ
प्रस्तावना
पाश्चात्य राजनीतिक चिंतन में थॉमस हॉब्स का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने राजनीति को धर्म, नैतिक उपदेश और आदर्शवाद से अलग करके वैज्ञानिक, यथार्थवादी और व्यवहारिक आधार पर समझने का प्रयास किया। हॉब्स ऐसे विचारक थे जिन्होंने यह प्रश्न उठाया कि यदि समाज में कोई सत्ता न हो, तो मनुष्य का जीवन कैसा होगा।
उनका संपूर्ण राजनीतिक दर्शन भय, असुरक्षा, आत्मरक्षा और शांति की अवधारणा के इर्द-गिर्द घूमता है। इंग्लैंड के गृहयुद्ध और राजनीतिक अराजकता ने उनके विचारों को स्पष्ट रूप से आकार दिया।
थॉमस हॉब्स का जीवन परिचय
थॉमस हॉब्स का जन्म 5 अप्रैल 1588 ई. को इंग्लैंड के माल्म्सबरी (Malmesbury) में हुआ। यह वही समय था जब इंग्लैंड स्पेनिश आर्मडा के आक्रमण के भय से ग्रस्त था। हॉब्स स्वयं कहते थे कि उनका जन्म “डर” के साथ हुआ, और यही डर उनके पूरे दर्शन में दिखाई देता है।
हॉब्स ने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की और ग्रीक-लैटिन साहित्य का गहन अध्ययन किया। वे एक कुलीन परिवार के शिक्षक और सचिव के रूप में कार्य करते रहे, जिससे उन्हें यूरोप की राजनीति और बौद्धिक दुनिया को नज़दीक से देखने का अवसर मिला।
उन्होंने फ्रांस और इटली की यात्राएँ कीं और गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों के विचारों से प्रभावित होकर राजनीति को भी विज्ञान की तरह (scientific method) समझने की कोशिश की।
इंग्लैंड वापसी और गृहयुद्ध का प्रभाव
इंग्लैंड के गृहयुद्ध (Civil War) के दौरान हॉब्स ने राजनीतिक अराजकता, सत्ता संघर्ष और हिंसा को निकट से देखा। इसी अनुभव ने उन्हें यह विश्वास दिलाया कि कमजोर सरकार समाज को विनाश की ओर ले जाती है।
इसी पृष्ठभूमि में उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति Leviathan (1651) लिखी गई, जिसका उद्देश्य शांति और स्थिरता का तर्कसंगत आधार प्रस्तुत करना था।
थॉमस हॉब्स कौन थे?
थॉमस हॉब्स एक महान पाश्चात्य राजनीतिक दार्शनिक, विचारक और लेखक थे। उन्हें आधुनिक राज्य सिद्धांत और सामाजिक अनुबंध सिद्धांत के प्रारंभिक प्रवर्तकों में गिना जाता है।
हॉब्स का मुख्य योगदान यह है कि उन्होंने राजनीति को मानव स्वभाव, भय और स्वार्थ के आधार पर समझाया, न कि नैतिक आदर्शों के आधार पर।
उनके अनुसार मनुष्य मूल रूप से सामाजिक प्राणी नहीं है, बल्कि वह अपनी सुरक्षा और हित से संचालित होता है। इसलिए समाज में शांति बनाए रखने के लिए एक शक्तिशाली और केंद्रीकृत सत्ता आवश्यक है।
थॉमस हॉब्स के राजनीतिक विचार
हॉब्स के राजनीतिक विचारों को निम्नलिखित अवधारणाओं के माध्यम से स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है:
1. मानव स्वभाव की अवधारणा
राजनीतिक दर्शन में मानव स्वभाव की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि शासन की प्रकृति इस बात पर निर्भर करती है कि मनुष्य को मूल रूप से कैसा माना जाता है। यदि मनुष्य स्वभाव से अच्छा और सहयोगी है, तो सीमित शासन पर्याप्त हो सकता है; लेकिन यदि मनुष्य स्वार्थी और हिंसक है, तो एक मजबूत राज्य आवश्यक हो जाता है।
हॉब्स ने मानव स्वभाव को यथार्थवादी और निराशावादी दृष्टिकोण से देखा।
हॉब्स के अनुसार:
मनुष्य स्वभाव से स्वार्थी होता है
प्रत्येक व्यक्ति अपने हित और सुरक्षा को सर्वोपरि मानता है
मनुष्य में सत्ता और संपत्ति प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होती है
हॉब्स का मानना था कि यही स्वभाव समाज में संघर्ष और असुरक्षा को जन्म देता है।
प्रसिद्ध कथन:
“Man is wolf to man”
(मनुष्य, मनुष्य का भेड़िया है)
2. प्राकृतिक अवस्था (State of Nature)
प्राकृतिक अवस्था वह काल्पनिक स्थिति है जहाँ कोई शासन, कानून या सामाजिक नियंत्रण नहीं होता। हॉब्स ने इस अवधारणा का प्रयोग यह दिखाने के लिए किया कि बिना सत्ता के समाज कैसा होगा।
उनके अनुसार प्राकृतिक अवस्था में स्वतंत्रता तो होती है, लेकिन शांति नहीं।
हॉब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में:
- कोई कानून नहीं होता
- कोई नैतिक नियम नहीं होते
- कोई शासन या न्याय व्यवस्था नहीं होती
- इस अवस्था को हॉब्स ने कहा:
(War of all against all)
यहाँ जीवन भयपूर्ण, असुरक्षित और अनिश्चित होता है।
3. प्राकृतिक अधिकार (Natural Rights)
प्राकृतिक अधिकार वे अधिकार हैं जो मनुष्य को जन्म से प्राप्त होते हैं। हॉब्स के अनुसार प्राकृतिक अवस्था में प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन की रक्षा के लिए सब कुछ करने का अधिकार होता है।
लेकिन यही अधिकार जब सभी को समान रूप से प्राप्त होते हैं, तो टकराव उत्पन्न होता है।
हॉब्स के अनुसार:
- प्रत्येक व्यक्ति को आत्मरक्षा का अधिकार है
- व्यक्ति जो चाहे करने के लिए स्वतंत्र है
- इन अधिकारों पर कोई सीमा नहीं होती
- परिणामस्वरूप समाज अराजकता की ओर बढ़ता है।
4. सामाजिक अनुबंध (Social Contract)
जब प्राकृतिक अवस्था में जीवन असहनीय हो जाता है, तब मनुष्य विवेक का प्रयोग करता है और शांति के लिए समझौता करता है। यही समझौता सामाजिक अनुबंध कहलाता है।
हॉब्स के सामाजिक अनुबंध का आधार भय और सुरक्षा है, न कि नैतिक कर्तव्य।
हॉब्स के अनुसार:
सामाजिक अनुबंध जनता आपस में करती है
लोग अपने प्राकृतिक अधिकार संप्रभु को सौंप देते हैं
राज्य इस अनुबंध का पक्ष नहीं होता
5. संप्रभु सत्ता (Sovereign Power)
सामाजिक अनुबंध के बाद एक संप्रभु सत्ता का निर्माण होता है। हॉब्स के अनुसार यह सत्ता तभी प्रभावी होगी जब वह पूर्ण, निरंकुश और अविभाज्य होगी।
यदि सत्ता कमजोर होगी, तो समाज फिर से अराजकता में चला जाएगा।
हॉब्स के अनुसार संप्रभु:
कानून से ऊपर होता है
उसकी शक्ति सीमित नहीं होती
उसके निर्णय अंतिम होते हैं
6. निरंकुश राज्य का समर्थन
हॉब्स ने लोकतंत्र, शक्ति विभाजन और सीमित सरकार की आलोचना की। उनका मानना था कि सत्ता का विभाजन राज्य को कमजोर बनाता है और गृहयुद्ध को जन्म देता है।
इसीलिए उन्होंने निरंकुश लेकिन स्थिर राज्य को शांति का सबसे प्रभावी साधन माना।
थॉमस हॉब्स की रचनाएँ
हॉब्स की रचनाएँ उनके राजनीतिक दर्शन को व्यवस्थित रूप में प्रस्तुत करती हैं:
1. Leviathan (1651)
इस ग्रंथ में राज्य को एक विशाल दैत्य के रूप में दिखाया गया है, जो समाज को अराजकता से बचाता है। यह कृति गृहयुद्ध की पृष्ठभूमि में लिखी गई।
2. De Cive
इसमें नागरिक जीवन और सामाजिक अनुबंध की व्याख्या की गई है।
3. The Elements of Law
यह उनकी प्रारंभिक रचना है, जिसमें कानून और शासन की मूल अवधारणाएँ मिलती हैं।
4. Human Nature
इस ग्रंथ में हॉब्स ने मानव स्वभाव का दार्शनिक विश्लेषण प्रस्तुत किया है।
निष्कर्ष
थॉमस हॉब्स का राजनीतिक दर्शन यथार्थ, भय और सुरक्षा पर आधारित है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि यदि राज्य कमजोर होगा, तो समाज अराजकता में डूब जाएगा।
यद्यपि उनके विचार निरंकुश माने जाते हैं, फिर भी आधुनिक राजनीतिक चिंतन में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
हॉब्स हमें यह सिखाते हैं कि शांति की कीमत कभी-कभी स्वतंत्रता होती है। Click: जीन जैक्स रूसो का जीवन परिचय

एक टिप्पणी भेजें