लोकसभा क्या है? तथा 10 मुख्य कार्य एवं शक्तियां

लोकसभा का परिचय तथा कार्य एवं शक्तियां 

लोकसभा, भारतीय संविधान के संदर्भ में लोगों का प्रतिनिधित्व करने वाला सदन है और यह भारतीय संसद का निचला सदन है। यहाँ पर संसद के उच्च सदन के रूप में राज्य सभा होती है। लोकसभा के सदस्यों को उनके निर्वाचन क्षेत्रों से चुना जाता है, और वे एक सामान्य बहुमत प्रणाली के माध्यम से चुने जाते हैं। वे अपनी सीटों पर पाँच साल तक सेवा करते हैं या जब तक संसद को राष्ट्रपति या केंद्रीय मंत्री परिषद् की सलाह पर भंग नहीं कर दिया जाता। 

लोकसभा के कार्य एवं शक्तियां 

(1) वित्तीय अधिकार 

लोकसभा का वित्त विधेयकों पर पूर्ण अधिकार है। वित्त विधेयक राज्यसभा को केवल सिफारिश करने के लिए भेजे जाते हैं, जिन पर स्वीकृति प्रदान करने के लिए राज्यसभा को 14 दिन का समय दिया जाता है। यदि राज्यसभा 14 दिन तक विधेयक को अपनी सिफारिश के साथ वापस नहीं भेजती है तो भी विधेयक पारित मान लिया जाता है। इस प्रकार राज्यसभा वित्त विधेयक को अधिक से अधिक 14 दिन तक रोक सकती है अर्थात पारित होने में 14 दिन का विलंब कर सकती है। वित्त विधेयक पहले लोकसभा में प्रस्तुत किए जाते हैं, राजसभा में नहीं। कौन विधायक वित्त विधेयक अथवा साधारण विधेयक, इसका निर्णय करने का अधिकार लोकसभा अध्यक्ष को होता है।

(2) विधायिनी अधिकार 

 साधारण विधेयक संसद के किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है, परंतु किसी भी विधायक के कानून बनने से पूर्व उसे लोकसभा द्वारा पारित किया जाना अनिवार्य है। साधारणतया महत्वपूर्ण विधेयक प्रायः लोकसभा में ही प्रस्तुत किए जाते हैं। यदि कोई विधायक राज्यसभा में प्रस्तुत किया गया हो तो उसका लोकसभा में पारित होना अति आवश्यक है। यदि विधेयक के संबंध में दोनों सदनों में मतभेद हों और उसे पारस्परिक विचार विमर्श द्वारा दूर ना किया जा सके तो राष्ट्रपति दोनों सदनों की संयुक्त बैठक बुला सकता है। संयुक्त बैठक का अध्यक्ष से लोकसभा का अध्यक्ष होता है। लोकसभा के सदस्यों की संख्या राज्यसभा के सदस्यों की संख्या की दोगुनी से भी अधिक है, अतः विधायकों को पारित करने में लोकसभा की स्थिति राज्यसभा की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण है।

(3) निर्वाचन संबंधी अधिकार 

लोकसभा के सदस्य स्वयं अपने में से ही अपने अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष का चुनाव तो करते ही हैं, साथ-साथ लोकसभा के सदस्यों का राष्ट्रपति की निर्वाचन में भी महत्वपूर्ण योगदान रहता है। लोकसभा के सदस्य उपराष्ट्रपति के निर्वाचन में भी भाग लेते हैं।

(4) कार्यपालिका पर नियंत्रण 

केंद्रीय मंत्रिमंडल सामूहिक रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदाई है, उसका विश्वास होने पर मंत्रिमंडल को त्यागपत्र देना पड़ता है। यदि लोकसभा मंत्रिमंडल के विरुद्ध अविश्वास का प्रस्ताव पारित कर देती है, तुम मंत्री मंडल को त्यागपत्र देना पड़ता है। लोकसभा के सदस्य मंत्रियों से प्रश्न और पूरक प्रश्न पूछ सकते हैं तथा स्थगन-प्रस्ताव प्रस्तुत कर सकते हैं। सदस्यों को सरकार के विभिन्न विभागों की आलोचना करने का भी पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है। इनकी अतिरिक्त लोकसभा सरकारी विधेयक अथवा बजट को अस्वीकार करके अथवा मंत्रियों के वेतन में कटौती करके मंत्रिमंडल पर नियंत्रण रखती है।

(5) जांच संबंधी अधिकार 

राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लोकसभा और राज्यपाल दोनों ही प्रस्तुत कर सकती हैं। यदि राष्ट्रभा इस संदर्भ में दोषारोपण करती है तो उसकी जांच लोकसभा करती है। यदि राशिफल उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव पारित कर तो उसे पर लोकसभा की स्वीकृति भी आवश्यक है किंतु लोकसभा उपराष्ट्रपति को हटाने का प्रस्ताव पारित नहीं कर सकती है। यदि किसी संकट काल में विभिन्न घोषणा को जारी रखना आवश्यक ही है तो उन पर लोकसभा की स्वीकृति आवश्यक है। यदि उच्चतम न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश को दुर्व्यवहारित हुआ और सामर्थ्य के आधार पर हटाने का प्रस्ताव हो तो उसके लिए लोकसभा तथा राशिफल का प्रस्ताव 2/3 बहुमत से स्वीकृति होना आवश्यक है। 

(6) संविधान संशोधन संबंधित अधिकार 

लोकसभा राज्यसभा के साथ संविधान के संशोधन में भी भाग लेती है। संविधान में संशोधित करने की प्रक्रिया से संबंधित विधेयक लोकसभा अथवा राष्ट्रवाद किसी भी सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है। संसाधन की प्रस्ताव को पारित होने के लिए यह आवश्यक है कि उसे संसद के दोनों सदनों के द्वारा अलग-अलग सदन की संपूर्ण सदस्य संख्या की बहुमत एवं उपस्थिति तथा मत देने वाले सदस्यों के 2/3 बहुमत से पारित होना चाहिए। यदि संविधान संशोधन विधेयक पर दोनों सदनों में मतभेद हो जाता है तो संयुक्त अधिवेशन की व्यवस्था नहीं है। संविधान का 24 वां संशोधन विधेयक लोकसभा ने स्वीकार कर लिया था, राज शिवानी उसमें भी पांच संशोधन कर दिए। बाद में लोकसभा ने भी इन संशोधनों को स्वीकार कर लिया। 

(7) संबोधन संबंधित कार्य एवं शक्तियां 

संविधान में संशोधन करने के लिए, एक संशोधन विधेयक को लोकसभा या राज्य सभा में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसे विधेयक को दोनों सदनों के बीच पारित करने के लिए आवश्यक बहुमत की आवश्यकता होती है। यदि विधेयक को एक सदन द्वारा पारित किया जाता है, तो यह अन्य सदन में प्रस्तुत किया जा सकता है, जिसे फिर से बहुमत से पारित करना होगा। एक बार विधेयक संविधान के संशोधन के लिए स्वीकृत हो जाता है, तो यह राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता होती है। इसके बाद, विधेयक को लागू होने के लिए संविधान के अनुच्छेद 368 के अनुसार राज्यपाल या राष्ट्रपति की मंजूरी की आवश्यकता होती है।

(8) जनता की शिकायतों का निवारण 

लोकसभा के सदस्य जनता की प्रतिनिधि होते हैं और वे ही सामान्य जनता को वास्तविक कठिनाइयों का सही ज्ञान रखते हैं। वे ही उनकी शिकायत सरकार तक पहुंचाते हैं और उनको दूर करने के लिए प्रयत्न करते हैं। 

(9) लोकसभा के वित्तीय कार्य 

लोकसभा भारतीय संविधान के अनुसार राजकोष को नियंत्रित करने की प्रमुख अधिकारीकृत संस्था है। इसका एक मुख्य कार्य राष्ट्रीय बजट की मंजूरी और सरकारी व्यय की अनुमति देना है। कोई भी बजट प्रस्तुत नहीं किया जा सकता और कोई भी सरकारी व्यय नहीं किया जा सकता बिना संसद की मंजूरी के। इसके अलावा, धन विधेयक या वित्तीय कानून केवल लोकसभा में प्रस्तुत किया जा सकता है, जो कि संसद के लोकप्रतिनिधियों द्वारा प्रतिपुष्टि के लिए परीक्षण किया जाता है। यह सुनिश्चित करता है कि सरकार के वित्तीय प्रस्तावों और नीतियों को सार्वजनिक प्रतिस्थापन से पहले सार्वजनिक चर्चा और परीक्षण किया जाता है।

(10) मंत्रिपरिषद पर नियंत्रण 

मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति जिम्मेदार होती है और यह लोकसभा के विश्वास पर निर्भर होती है। जब तक लोकसभा इसे अपना विश्वास प्रकट नहीं करती, मंत्रिपरिषद सत्ता में नहीं रह सकती।

निष्कर्ष 

इन सभी विवेचनाओं के आधार पर यह कहा जा सकता है कि लोकसभा का भारतीय संसद में अत्यधिक महत्वपूर्ण स्थान है, उसकी शक्तियां अद्वितीय तथा अतुलनीय है। इस संबंध में डॉ० एम० पी० शर्मा ने लोकसभा का मूल्यांकन इन शब्दों में किया है, “यदि संसद राज्य का सर्वोच्च अंग है तो लोकसभा सांसद का सर्वोच्च अंग है। व्यवहारत: लोकसभा ही सांसद है।” 

Post a Comment

और नया पुराने