परिकल्पना (Hypothesis) अर्थ, जनक एवं निर्माण की प्रक्रिया
प्रस्तावना
अनुसंधान की प्रक्रिया केवल तथ्यों को इकट्ठा करने तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह तथ्यों के पीछे छिपे कारणों और संबंधों को समझने का प्रयास भी करती है। किसी भी वैज्ञानिक या सामाजिक अनुसंधान की शुरुआत एक ऐसे विचार से होती है, जो यह संकेत देता है कि समस्या का संभावित समाधान क्या हो सकता है। इसी प्रारंभिक विचार को परिकल्पना कहा जाता है।
राजनीतिक विज्ञान जैसे विषय में, जहाँ मानव व्यवहार, सत्ता, संस्थाएँ और नीतियाँ अध्ययन का विषय होती हैं, वहाँ परिकल्पना अनुसंधान को स्पष्ट दिशा प्रदान करती है। बिना परिकल्पना के अनुसंधान केवल वर्णनात्मक रह जाता है और ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाता।
परिकल्पना का अर्थ
परिकल्पना का अर्थ किसी समस्या या घटना के संबंध में किया गया ऐसा अस्थायी कथन है, जिसे आगे चलकर तथ्यों और आँकड़ों की सहायता से परखा जा सके। यह न तो पूर्ण सत्य होती है और न ही केवल कल्पना, बल्कि यह अनुसंधानकर्ता द्वारा किया गया एक तार्किक अनुमान होता है।
अनुसंधानकर्ता जब किसी विषय का अध्ययन करता है, तो वह पहले से उपलब्ध ज्ञान, सिद्धांतों, अनुभवों और तथ्यों के आधार पर यह अनुमान लगाता है कि दो या दो से अधिक चर के बीच कोई संबंध हो सकता है। यही अनुमान परिकल्पना के रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
राजनीतिक अनुसंधान में परिकल्पना यह स्पष्ट करने का प्रयास करती है कि किसी राजनीतिक घटना के पीछे कौन से कारण काम कर रहे हैं या किसी नीति का समाज पर क्या प्रभाव पड़ सकता है। इस प्रकार परिकल्पना अनुसंधान को उद्देश्यपूर्ण और केंद्रित बनाती है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो परिकल्पना वह कथन है, जिसका परीक्षण करके अनुसंधानकर्ता यह निर्धारित करता है कि उसका अनुमान सही है या नहीं।
परिकल्पना का जनक कौन था?
परिकल्पना की अवधारणा का विकास आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान पद्धति के साथ जुड़ा हुआ है। यद्यपि अनुमान और तर्क का प्रयोग प्राचीन काल से होता आ रहा है, लेकिन परिकल्पना को वैज्ञानिक अनुसंधान का एक औपचारिक और अनिवार्य अंग बनाने का श्रेय आधुनिक दार्शनिकों को दिया जाता है।
आधुनिक अनुसंधान पद्धति में परिकल्पना की वैज्ञानिक भूमिका को स्पष्ट करने का श्रेय मुख्य रूप से कार्ल पॉपर को दिया जाता है। उन्होंने यह विचार प्रस्तुत किया कि कोई भी सिद्धांत तब तक वैज्ञानिक नहीं माना जा सकता, जब तक वह परीक्षण योग्य और खंडनीय न हो। इस विचार ने परिकल्पना को अनुसंधान की आधारशिला बना दिया।
पॉपर के अनुसार ज्ञान की प्रगति अनुमान और उसके परीक्षण के माध्यम से होती है। यही सिद्धांत सामाजिक विज्ञानों, विशेषकर राजनीतिक विज्ञान में परिकल्पना के निर्माण और परीक्षण का आधार बन गया।
परिकल्पना का निर्माण
परिकल्पना का निर्माण अनुसंधान प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण चरण माना जाता है। यदि परिकल्पना स्पष्ट, तार्किक और परीक्षण योग्य नहीं होगी, तो पूरा अनुसंधान दिशाहीन हो सकता है। इसलिए परिकल्पना का निर्माण सोच-समझकर और एक क्रमबद्ध प्रक्रिया के अंतर्गत किया जाना चाहिए। परिकल्पना निर्माण की प्रक्रिया को निम्नलिखित उपशीर्षकों के माध्यम से समझा जा सकता है।
1. अनुसंधान समस्या की पहचान
परिकल्पना के निर्माण का पहला और सबसे आवश्यक चरण अनुसंधान समस्या की पहचान है। अनुसंधानकर्ता सबसे पहले यह तय करता है कि वह किस राजनीतिक, सामाजिक या प्रशासनिक समस्या का अध्ययन करना चाहता है। यह समस्या चुनावी व्यवहार, सार्वजनिक नीति, राजनीतिक भागीदारी या सत्ता संरचना से संबंधित हो सकती है।
जब तक समस्या स्पष्ट नहीं होगी, तब तक परिकल्पना भी अस्पष्ट रहेगी। इसलिए समस्या की सही पहचान परिकल्पना निर्माण की आधारशिला होती है।
2. संबंधित साहित्य का अध्ययन
समस्या की पहचान के बाद अनुसंधानकर्ता उस विषय से संबंधित उपलब्ध साहित्य का अध्ययन करता है। इसमें पुस्तकें, शोध पत्र, जर्नल और पूर्व अनुसंधान शामिल होते हैं। साहित्य अध्ययन से यह समझने में सहायता मिलती है कि उस विषय पर पहले क्या कार्य हो चुका है और किन पहलुओं पर अभी और अध्ययन की आवश्यकता है।
यह चरण परिकल्पना को दोहराव से बचाता है और उसे अधिक तार्किक बनाता है।
3. तथ्यों और अनुभव का विश्लेषण
साहित्य अध्ययन के बाद अनुसंधानकर्ता उपलब्ध तथ्यों, आँकड़ों और अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर समस्या पर विचार करता है। इस चरण में वह यह अनुमान लगाने का प्रयास करता है कि विभिन्न कारकों के बीच किस प्रकार का संबंध हो सकता है।
यहीं से परिकल्पना का प्रारंभिक स्वरूप विकसित होता है, जो आगे चलकर एक स्पष्ट कथन का रूप लेता है।
4. संभावित संबंधों का निर्धारण
इस चरण में अनुसंधानकर्ता यह निर्धारित करता है कि किन चर (variables) के बीच संबंध की जाँच की जानी है। उदाहरण के लिए, शिक्षा और मतदान व्यवहार के बीच संबंध या आर्थिक स्थिति और राजनीतिक भागीदारी के बीच संबंध।
यह चरण परिकल्पना को केंद्रित और सीमित बनाता है, जिससे अनुसंधान अधिक प्रभावी हो जाता है।
5. परीक्षण योग्य कथन का निर्माण
एक अच्छी परिकल्पना वही मानी जाती है जिसे तथ्यों और आँकड़ों के माध्यम से परखा जा सके। इसलिए परिकल्पना को इस रूप में प्रस्तुत किया जाता है कि वह परीक्षण योग्य हो।
सामान्य, मूल्यात्मक या नैतिक कथन परिकल्पना नहीं माने जाते, क्योंकि उन्हें वैज्ञानिक रूप से जाँचा नहीं जा सकता।
6. स्पष्टता और सरलता
परिकल्पना का अंतिम चरण उसकी भाषा और संरचना से जुड़ा होता है। परिकल्पना सरल, स्पष्ट और संक्षिप्त होनी चाहिए। जटिल और अस्पष्ट परिकल्पना अनुसंधान को भ्रमित कर सकती है।
इसलिए एक अच्छी परिकल्पना वही होती है जिसे आसानी से समझा जा सके और जिसका परीक्षण स्पष्ट रूप से किया जा सके।
परिकल्पना का महत्व
अनुसंधान प्रक्रिया में परिकल्पना का महत्व अत्यंत व्यापक है। यह केवल अनुसंधान की शुरुआत नहीं करती, बल्कि पूरे अध्ययन को दिशा प्रदान करती है। परिकल्पना के महत्व को निम्नलिखित उपशीर्षकों के माध्यम से समझा जा सकता है।
1. अनुसंधान को दिशा प्रदान करना
परिकल्पना अनुसंधानकर्ता को यह स्पष्ट करती है कि उसे किस दिशा में अध्ययन करना है। इसके बिना अनुसंधान केवल तथ्यों का संग्रह बनकर रह जाता है। परिकल्पना अनुसंधान को एक निश्चित लक्ष्य प्रदान करती है।
2. अनुसंधान को वैज्ञानिक स्वरूप देना
परिकल्पना अनुसंधान को वैज्ञानिक बनाती है, क्योंकि यह परीक्षण, प्रमाण और विश्लेषण पर आधारित होती है। इसके माध्यम से अनुसंधान भावना या व्यक्तिगत मत पर आधारित न होकर तथ्यों पर आधारित होता है।
3. तथ्यों के चयन में सहायता
परिकल्पना यह तय करने में सहायता करती है कि कौन-से तथ्य और आँकड़े अनुसंधान के लिए आवश्यक हैं और कौन-से नहीं। इससे अनावश्यक तथ्यों के संग्रह से बचा जा सकता है।
4. समय और संसाधनों की बचत
स्पष्ट परिकल्पना अनुसंधान को सीमित और केंद्रित बनाती है। इससे अनुसंधानकर्ता का समय, श्रम और संसाधन व्यर्थ नहीं होते और अनुसंधान अधिक प्रभावी बनता है।
5. विश्लेषण और निष्कर्ष को स्पष्ट बनाना
परिकल्पना विश्लेषण की प्रक्रिया को सरल बनाती है। अनुसंधान के अंत में प्राप्त निष्कर्ष सीधे परिकल्पना से जुड़े होते हैं, जिससे निष्कर्ष अधिक स्पष्ट और तार्किक बनते हैं।
6. राजनीतिक अनुसंधान में विशेष महत्व
राजनीतिक विज्ञान में परिकल्पना का विशेष महत्व है, क्योंकि यहाँ मानव व्यवहार और संस्थागत प्रक्रियाएँ जटिल होती हैं। परिकल्पना इन जटिलताओं को समझने और उनके कारणों की व्याख्या करने में सहायता करती है।

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